स्वस्थ जीवन की चाह हर किसी की होती है, किन्तु जीवन पूर्णता अप्रत्याशित है। कब किस मोड़ पर क्या हो हम नहीं जानते ,लेकिन अगर हम मानसिक रूप से मजबूत है तो शारीरिक कमी भी हमें कमजोर नहीं बना सकती। सही मायने में सच्चा विजेता तो वही है जो अपने जीवन की हर कमी को भूल कर दूसरो की जिंदगियों को रोशन करने में अपना सर्वस्व त्याग देता है। फिर चाहे शारीरिक अक्षमता हो या विपरीत परिस्थितियां हर शब्द के अर्थ सूक्ष्म हो जाते हैं। ऐसा ही एक प्रेरणादायक उदहारण हमारे समक्ष प्रस्तुत हुआ है गोपाल खंडेलवाल का जोकि 18 वर्षो से व्हीलचेयर पर हैं। लेकिन निस्वार्थ भावना व जज़्बा ऐसा की आज हज़ारो गरीब बच्चों को निशुल्क पढ़ा कर उन्हें समाज में एक सम्मानजनक स्थान दिलवा रहें हैं।
48 वर्षीय गोपाल खंडेलवाल बनारस के एक साधारण परिवार से है। जब वे मात्र 27 वर्ष के थे तो एक सड़क हादसे ने उनके शरीर के निचले भाग को पैरालाइज़्ड कर दिया। तीन सालों तक इनका इलाज BHU में चला लेकिन कोई सुधार न दिखने पर गोपाल की हिम्मत टूटने लगी। माँ बाप थे नहीं ,दो भाई थे वो भी अपने जीवन में व्यस्त थे ,कोई देख रेख करने वाला नहीं था।
तब गोपाल के दोस्त डॉ अमित दत्ता ने इन्हे संभाला और इन्हे अपने साथ गॉव चलने की सलाह दी।फिर डॉ अमित गोपाल को अपने साथ मिर्ज़ापुर जिला मुख्यालय से आठ किमी दूर कछवा ब्लॉक के पत्तिकापुर गॉव ले आयें। वहां उनके लिए एक कमरा भी बनवा दिया। गोपाल का गॉव में मन तो लगने लगा लेकिन खाली बैठ कर समय काटना उनके लिए बहुत मुश्किल होने लगा। फिर उन्होंने बच्चों को निशुल्क पढ़ाने का मन बनाया और एक बगीचे में इन्होने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। पहले दिन सिर्फ एक ही लड़की पढ़ने आयी लेकिन धीरे धीरे लोगों ने विश्वास दिखाया और बच्चो की संख्या में बढ़ोत्तरी होती चली गयी।
आज इनकी पाठशाला में 67 बच्चें पढ़ते है। गोपाल बताते है की अब उनका जीवन ये बच्चे ही हैं। जो उनके साथ सुबह 5 बजे से शाम के 6 बजे तक रहते है। ये बच्चे ही इन्हे सुबह चारपाई से उठाकर व्हीलचेयर पर बैठाते है व शाम को यही बच्चे इन्हे चारपाई पर वापस लेटा देते है। अपनी पाठशाला का नाम गोपाल ने अपनी माँ के नाम पर 'नोवाल शिक्षा संस्थान 'रखा। इनकी पाठशाला में बीते 18 वर्षो में हज़ारो बच्चे पढ़ चुके हैं। ये वे बच्चे हैं जो मजदूरी या अन्य कामो की वजह से स्कूल नहीं जा पाते हैं।
गोपाल सिर्फ इन बच्चो को पढ़ा ही नहीं रहें हैं बल्कि उन्हें जीवन जीने का सलीका भी सीखा रहें है। वे बच्चों को कपड़े पहनने से लेकर उठने बैठने खाना खाने का तरीका सीखा रहे हैं। ताकि वे समाज में अच्छा स्थान पा सकें। गरीब बच्चो को बेहतर शिक्षा मिले इसके लिए गोपाल खुद तो मेहनत करते ही है किन्तु वो चाहते है कि इन बच्चो को अच्छे स्कूलों में एडमिशन भी मिले ,जिसमे काफी हद तक वे सफल भी हो रहें हैं। इसके लिए उन्हें सोशल साईट काफी मदद मिल रही है। जो बच्चा गरीब किंतु पढ़ने की ललक रखता है उसकी फोटो या विडिओ बना गोपाल फेसबुक पर डालते हैंऔर फेसबुक के मित्रो से यह अपील करते है अगर मुमकिन हो सके तो वे उस बच्चे की पढाई का खर्चा उठायें। वे मित्रगण इनके अकाउंट में फीस के पैसे भेजते हैं। फिर गोपाल उन बच्चो का अच्छे स्कूल में एडमिशन करवाते है। वर्तमान में 50 से अधिक बच्चे स्कूलों में पढ़ने जा रहें हैं। गोपाल बच्चो को पढ़ाने के अलावा गॉव वालो का इलाज़ भी करते है। इनके दोस्त डॉ अमित इनको कई प्रकार की दवाएं देते हैं जिन्हे ज़रुरत पड़ने पर वे गॉव वालो को देते हैं।
गोपाल के जीवन में उनके दोस्त डॉ अमित का विशेष स्थान है। गोपाल बताते है की वे अपने जीवन से हार मान चुके थे और जब उनके साथ कोई नहीं था तो अमित ने ही उन्हें संभाला व् प्रत्येक पल जीवन के प्रति सकारात्मक रवैया बनाये रखने पर बल दिया। गोपाल मानते है की आज वो जो कुछ भी कर पा रहे है वो सिर्फ उनके दोस्त से ही मुमकिन हो पाया हैं।
गोपाल दो कदम भी चल पाने में समर्थ नहीं हैं किन्तु आज उन्होंने हज़ारों बच्चों को समाज में खड़े होने के काबिल बनाया हैं। जिन्हे हमारे समाज में वंचित समुदाय के नाम से जाना जाता है। गोपाल की शारीरिक अक्षमता कभी भी उनके इरादों को डिगा न सकी।आज उनके क्षेत्र के लोग उनके हौंसलों की मिसालें देते हैं।


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